शनिदेव का ज्योतिष स्थान और कारक

शनि की संक्षिप्त जानकारी 

शनि ग्रह सूर्य से छठा नंबर का और वृहस्पति के बाद दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है। यह पृथ्वी से नौ गुना बड़ा है, शनि के 53 उपग्रह हैं जिनका नामकरण किया गया है। टाइटन शनि का सबसे बड़ा उपग्रह है जो बुध ग्रह से बहुत बड़ा है, यह एक मात्र ऐसा उपग्रह है जिसके पास अपना वायुमंडल है। 

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शनि के पास एक वलय है यह नौ मुख्य छल्लों और तीन असतत चाप से मिलकर बने हुए हैं, यह वलय के पत्थरों, मलबे और बर्फ के टुकड़ों से बने हुए है।
शनि को गैस के दानव के रूप में वर्गीकृत किया गया है, इसकी सतह तरल हायड्रोजन का बना हुआ है, इसका घनत्व कम होने के कारण गैस जैसा व्यवहार करता है।
   सूर्य से शनि की दूरी 1.4 अरब मीटर से भी अधिक है, यह पृथ्वी समय के अनुसार है। 
सूर्य का चक्कर 10759 दिनों मे पूरा कर लेता है, इसकी चाल अन्य योजनाओं की तुलना में काफी धीमी है, यह 9.69 किमी / सेकंड की दर से गति करती है। है। है। है। है। 
शनि का अंग्रेजी नाम शनि है जो एक रोमन देवता के नाम पर रखा गया है। 

ज्योतिष में स्थान 

शनि को ज्योतिष में धीमे चलने वाले ग्रह मे लिया जाता है, इनकी शनि देव के रूप मे आराधना की जाती है,इन्हें सूर्य पुत्र भी कहा गया है। शनिदेव को शनिवार का दिन समर्पित है। 
   भारत के हर शहरों मे शनि देव का मंदिर है पर एक प्रमुख मंदिर शनि शिग्नापुर मे है, जिसकी मान्यता बहुत अधिक है, देश विदेश से लोग शनि देव की पूजा और दर्शन के लिए यहां आते हैं, चमत्कारिक बात है कि यहां किसी के घर या दुकान मे दरवाजे नहीं होते और ताला भी नहीं लगाया जाता, कहा जाता है कि शनि देव के डर से यहां चोरी नहीं होती है। अगर आपके अंदर भी अभिलाषा जागे तो एक बार जाना चाहिए।
शनि देव न्याय के देवता माने जाते हैं, कर्मों के अनुसार फल प्रदान करना इनका कार्य है, लोग इनकी न्याय से भयभीत रहते हैं, क्योंकि अच्छे कार्यों का अच्छा और बुरा कर्म का बुरा फल भोगना तय है।शनि की साढ़ेसाती, और शनि की ढैया, माना जाता है कि जो आगे चलकर उसके साथ बड़े चरित्र घटता है।, इसकी चर्चा होगी। 
   शनि देव के मित्र ग्रह बुध, शुक्र, राहु और केतु है और शत्रु ग्रह सूर्य, चंद्र और मंगल हैं। पुष्य, अनुराधा और उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र इनकी राशि मे ही आते हैं। 
मकर और कुम्भ  राशि के स्वामी शनि देव हैं। 
मकर राशि में उच्च के और मेष मे नीच के होते हैं। 

जिस जातक के लग्न मे शनि देव हों तो शनि देव सदा शुभ फल देने वाले होते हैं, गरीब घर मे पैदा होने के बावजूद अपने कर्मों से महान बन जाते है। 
कालपुरुष की कुंडली मे शनि देव की तीन दृष्टि होती है 3,7और 10वा घर। जिन घरों मे शुभ फल देते हैं वे घर 3,6 और 11 वा घर हैं। शनि की दृष्टि शुभ फल नहीं देती ऐसे मे देखा जा सकता है कि जहां शनि दृष्टिगत हो रहे हैं वहां मित्र ग्रह हैं या शत्रु ग्रह हैं। 

शनि का कारक तत्व 

भूमि के अंदर से निकलने वाले पूरे तत्व -कोयला , पेट्रोल, खनिज आदि पर शनि का कारकत्व है। 

इसके अलावा लोहे और पानी के कारखाने और लोहे से बनाए जाने वाले वस्तु , काले रंग और काले रंग की कपड़े या काले रंग का समान, न्यायाधीश, सफाई कर्मचारी, मजदूर, गरीब, भिकारी, आलस, कोर्ट कचहरी, कौवा, मृत्यु, चमड़ा, कारखाना, , सत्कर्म , धर्म, आयु, योगी, सन्यासी, दंडाधिकारी, प्लास्टिक का कारखाना और उससे बने वस्तुए, नीलम,काली तिल, उडद और उडद की दाल आदि पर शनि देव का नियंत्रण होता है।

शनि की साढ़ेसाती और ढैया 


जब जातक की जन्म राशि से द्वादश में अथवा प्रथम या द्वितीय मे शनि हो तो इस स्थिति को शनि की साढ़ेसाती कहते हैं। या साधारण शब्दों में कहें तो जब चंद्र पर शनि हो तो साढ़ेसाती कहते हैं। 
साढ़ेसाती मे जातक सही फैसले नहीं ले पाता, और जीवन मे उतार - चढ़ाव बढ़ जाते हैं, करना कुछ चाहता है होता कुछ और जाता है। जातक को बहुत कष्ट उठाने पड़ते हैं। हालांकि कभी कभी यह अच्छा भी हो जाता है, ऐसा नहीं है कि इस अवस्था मे हर काम बिगाड़ हो जाए, यह शनि की दशा और अंतर्दशा पर निर्भर होता है। 
ज्यादातर मामलों में शनि के बुरे परिणाम भोगने पड़ते हैं, जिसकी कुंडली मे शनि शुभ फल प्रदायक हों वह रंक से राजा बन जाता है और जब बुरे हो जाएं तो शनि देव उसे मिट्टी मे भी मिला देते हैं, 
कभी कभी आपने देखा होगा कि एक व्यक्ति अपने अच्छे - बुरे कर्मों से साम्राज्य स्थापित कर लेता है और जब शनि देव हिसाब- किताब लेने पर आते हैं तब उस व्यक्ति का साम्राज्य ध्वस्त हो जाता है। 

 साढ़ेसाती से बचने का उपाय 

अगर आप चाहते हैं कि आपके पूरे जीवन मे शनि देव बुरे फल ना दें तो आपको निम्न बातों का अनुसरण करना चाहिए - 
1)- आपको  शराब, मांस या तामसी भोजन का त्याग करना चाहिए। 
2)- बुरे कर्म जैसे चोरी, धोखा, व्याभिचार, अन्याय, गलत धारणा, क्रोध, हिंसा आदि नहीं करनी चाहिए। 
3)- गरीब, भिखारियों की सेवा और सहयोग करना चाहिए। 
4)- मजदूरों और कामगारों को उचित मजदूरी दे,और उनका सम्मान करना चाहिए। 
अगर आप सदाचार का पालन करेंगे तो निश्चित ही आपको शनि के बुरे फल प्राप्त नहीं होंगे। 
याद रखने वाली बात यह है कि शनि धीमी गति से चलने के कारण जो हम कर्म करते हैं उसके तात्कालिक फल भले ही बहुत लाभदायक हो परंतु अगर पुण्य कर्म हो सो कई सालों बाद उसका विस्तार होगा। और यदि बुरे कर्म किए तो लाभ तो मिल जाएगा परंतु कई सालों बात आपका  मान सम्मान और धन हानि होना तय है। 
इसलिए शनि को न्यायाधीश कहा जाता है। 

शनि की ढैया 

शनि देव 2.5 साल मे अपनी राशि बदलते है जो एक साथ तीन राशियों पर चलता है। इन्हीं तीनों राशि को मिलाकर साढ़ेसाती कहा जाता है, अगली राशि मे शनि देव ढैया के रूप मे प्रवेश करते हैं तो उसके पिछली राशि पर ढैया का शीर्ष पर होता है तथा पिछले राशि पैर पर होता है और उसके पिछले राशी को छोड़ देते हैं, इसके फल भी शनि की साढ़ेसाती जैसा ही फल देते हैं। ढैया के केंद्र मे चंद्रमा होता है जो मन का कारक माने गए हैं। 

शनि से बनने वाले योग 

शश योग

जातक के लग्न कुंडली मे जब शनि देव अपनी स्वयं कि राशि (कुम्भ, मकर) में हो या शनि अपनी उच्च राशि तुला में रहकर केंद्र के घरों मे हों तो शश नामक योग बनता है, यह योग पंचमहापुरुष में से एक योग है जो जातक को शुभ फल प्रदान करने वाला होता है। 
इस योग मे जन्मा जातक, जो ठान लेता है पूरा करके ही दम लेता है। जातक क्रोधी स्वभाव का होता है। इच्छा शक्ति बहुत दृढ़ होती है, दूसरों की सेवा करने मे आनंद महसुस करता है। आध्यात्मिक प्रवृत्ति का होता है। शनि की साढ़ेसाती और ढैया का इस पर कोई असर नहीं पड़ता, अपने जीवन में अनेक ऊचाईयों को पाता है, खोजी स्वभाव का होता है, नदी के कलकल को निहारना प्रिय होता है और पहाड़ों और जंगलों की सैर करना बहुत भाता है, जड़ी बूटियों की अच्छी समझ और पहचान स्वतः ही प्राप्त हो जाता है ।