ज्योतिष में राहु का महत्व एवं कारक

राहु का संक्षिप्त परिचय



राहु का संक्षिप्त परिचय 

राहु कोई ग्रह नहीं होने के बाद भी इसे ग्रह का दर्जा प्राप्त है। राहु एक छाया ग्रह है। राहु और केतु दोनों छाया ग्रह हैं जो दोनों एक दूसरे के उल्टे बिंदु पर स्थित होते हैं, छाया बिंदु होने के कारण यह हमेशा उल्टे चलते हैं, जैसे प्रकाश के विपरित छाया चलती है, ठीक उसी तरह। सूर्य और चंद्र ग्रहण के समय जब सूर्य और चंद्र छाया से ढक जाते हैं उस छाया का प्रतीकात्मक         नाम राहु है, हिन्दू मान्यता है कि ग्रहण मे राहु ही सूर्य और चंद्र को ग्रहण लगाता है या ग्रास लेता है या निगल जाता है।
      राहु को अंग्रेजी मे ड्रैगन हेड भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है एक सर्प के आकार का राक्षस जिसका सिर कट चुका है। हिन्दू संस्कृति मे भी राहु को एक राक्षस स्वरभानु का कटा हुआ सिर है, जो एक कथा के अनुसार प्रचलित है,इसकी चर्चा हम आगे करेंगे। 
     भारतीय वैदिक ज्योतिष में राहु को कई चीजों का कारक बताया गया है, चूंकि यह छाया है इसलिए इसका प्रभाव भी ज्यादातर आंतरिक होता है, जो मन पर प्रभाव रखता है। 

राहु का जन्म कैसे हुआ

भारतीय शास्त्रों मे राहु के जन्म के कई कहानियां प्रचलित है परन्तु मैं ऐसी कहानी का जिक्र करूंगा जो ज्यादा वैज्ञानिक है।
 हालाँकि ये कथायें केवल लोगों को आसानी से समझाने का एक जरिया मात्र है, जिससे बिना तर्क के लोग मान जाएं कि यही सही है परन्तु इनके पीछे एक विज्ञान छुपा हुआ है। 

कथा के अनुसार 

जब देवताओं और राक्षसों के द्वारा समुद्र मंथन किया गया तब, अनेकों रत्न उत्पन्न होने लगे जिसमें एक अमृत था, जिसे पीकर कोई अमर हो जाता है, देवता चाहते थे कि राक्षस इसे ना पीने पाएँ क्योंकि राक्षस स्वभाव से ही अधर्मी होते हैं अमर होने से धरती को विनाश की ओर ले जाएंगे। इसलिए देवताओं और असुरों का दो ग्रुप बनाया गया, और मोहिनी जो भगवान विष्णु का रूप थी उन्हें अमृत का पात्र दिया गया, और पिलाने को तैयार किया गया, राक्षसों मे एक स्वरभानु नाम का असुर था जो बहुत चालाक और छ्द्मभेसी था उसने देवताओं की हरकत को जान लिया और देवता का रूप धारण कर के देवताओं के ग्रुप मे बैठ गया।
 सूर्यदेव और चन्द्रदेव ने अपने तेज पुंज से उनकी पहचान कर ली और भगवान विष्णु को सूचित कर दिया। और तत्काल विष्णु मे अपने चक्र सुदर्शन से स्वरभानू का सिर काट कर दूर फेंक दिया लेकिन तब तक वह अमृत पी चुका था, उसका सिर पुनः नहीं जुटा परंतु उसका सिर जो राहु बन कर एक तरफ और  शरीर जो केतु बनकर दूसरे तरफ चला गया जो जिवित रहा।
सूर्य और चंद्र के इस हरकत से राहु क्रोधित हो गया और  उन्हें खाने के लिए  भागता है, और निगल जाता है परंतु उसका सिर कट जाने के कारण सूर्य और चंद्र पुनः उसके गले से बाहर आ जाते हैं। यह कथा थी राहु के जन्म के विषय में।

राहु के कारक 

राहु एक क्रूर ग्रह की श्रेणी में आते हैं इसलिए इनके कारक में कुत्ता, काला कुत्ता, धुआं, भूरा रंग, मटमैला, रात, अंधेरा, अकस्मात, चोरी, क्रूरता, दुष्ट, शराब,. ड्रग्स, मांसाहार, हत्या, जेल, क्रोध, जाल, जालसाजी, सर्प, गिरगिट, नमक, स्वाद, भ्रम, शक, चालाक, हठ, दुर्घटना, कचरा, शौचालय, कबाड़, बंद पड़े समान, फीलिंग्स, ईच्छा, अतृप्त, बैर, बदला, जुआ, सट्टा, लॉटरी, अचानक कुछ खोना और अचानक कुछ पाना, तंत्र - मंत्र, जादू, टोन, नाखुन, मछली, काँटे, तंबाकू, चींटी, मछली फ़साने का हूक, कुल्हाड़ी या दूसरे औजारों की डण्डी, आरी, ताला, बारूद, बंदूक, पुलिस, वकील, निडर, भयभीत, छल, लालच, गंभीर अपराध, सनकीपन, भैरव आदि राहु के कारक तत्व हैं। 

राहुकाल क्या होता है 

जब समुन्दर मंथन किया गया तब अमृत भी निकला उपरोक्त आपने पढ़ा, उस कथा के अनुसार जब राहु का सर भगवान श्री हरि के द्वारा काट दिया गया, उस समय  सूर्यास्त का समय था और उसी काल को राहुकाल कहा जाता है, लेकिन यह काल रात को छोड़कर दिन में कभी भी हो सकता है, यह समय 1.5 घंटे का होता है अलग अलग दिन राहुकाल अलग अलग होता है। राहु का सिर कटने की घटना उस दिन शायंकाल की है जिसे पूरे दिन के घंटा मिनट का आँठवा भाग माना गया। कालगणना के अनुसार पृथ्वी पर किसी भी जगह के सूर्योदय के समय से सप्ताह के पहले दिन सोमवार को दिनमान के आँठवें भाग में से दूसरा भाग, शनिवार को दिनमान के आठवें भाग में से तीसरा भाग, शुक्रवार को आठवें भाग में से चौथा भाग, बुधवार को पांचवां भाग, गुरुवार को छठा भाग, मंगलवार को सातवां तथा रविवार को दिनमान का आठवां भाग राहुकाल होता होता है। 
राहुकाल मे किसी भी शुभ कार्य को वर्जित माना गया है, यात्रा पर निकालना भी वर्जित माना गया है, क्योंकि राहु को अकस्मात का ग्रह माना गया है इसलिए यह किसी का काम बिगाड़ने मे बड़ा भूमिका निभाता है।