शुक्र का ज्योतिष में महत्त्व एवं कारकत्व

शुक्र हमारे जीवन में स्त्री, वाहन और धन सुख को प्रभावित करता है। यह एक स्त्री ग्रह है। पुरुष के लिए स्त्री और स्त्री के लिए पुरुष शुक्र है। हिन्दू धर्म में लक्ष्मी, काली और गुरु शुक्राचार्य को शुक्र ग्रह से संबंधित माना जाता है। 
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शुक्र ग्रह का संक्षिप्त परिचय 

सुबह और शाम के समय आसमान मे चमकता हुआ दिखाई देता है जिसे भोर का तारा सदियों से कहा जाने वाला तारा ही शुक्र ग्रह है। इसका नंबर  सूर्य के क्रम से बृहस्पति के बाद आता है। अंग्रेजी मे इसका नाम vinus है जो रोम के एक  सुन्दर देवी के नाम पर रखा गया है । जिसका अर्थ सुंदरता से लिया गया है,शुक्र ग्रह धरातल वाला ग्रह है। यह सूर्य का एक चक्कर पृथ्वी के समय के हिसाब से 224.7 दिनों मे पूरा कर लेता है । इसका कोई उपग्रह नहीं है, इसका वायुमंडल कार्बन डाई आक्साइड से घिरा हुआ है जिसमें कम मात्रा मे अन्य गैसें भी मौजूद है,शुक्र की संरचना पृथ्वी के समान ही है इसीलिए इसे धरती की बहन भी कहा जाता है।यह सलफ्यूरिक एसिड के के बादलों से घिरा रहता है यह बादल सूर्य की किरणों को परावर्तित कर देते हैं इसलिए यह चमकदार दिखाई देता है परंतु इन्हीं कारणों से से शुक्र का धरातल कभी दिखाई नहीं देता। इसका वायुमंडलीय दाब पृथ्वी से 92 गुना अधिक है, यहां कोई जीवन नहीं है, इसकी धरातल विशाल चट्टानों का बना हुआ है ।

शुक्र ग्रह का ज्योतिष मे महत्व - 

वैदिक ज्योतिष मे शुक्र को सुंदरता और भोग विलास का कारक ग्रह माना गया है । उन्हें राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य के नाम से भी जाना जाता है, यह स्त्री प्रधान ग्रह माने जाते हैं। शुक्र एक राशि मे 23 दिन तक रहते हैं इसके बाद अगली राशि में प्रवेश कर जाते हैं, 
  शुक्र ग्रह  को वृष राशि और तुला राशि का स्वामित्व प्राप्त है,। 27 नक्षत्रों में भरणी, पुर्वाषाढा और पुर्वाभाद्रपदा नक्षत्र का स्वामी भी हैं ।
कन्या राशि में नीच के फल देने वाले तथा मीन राशि में उच्च के फल देने वाले माने जाते हैं । 
बुध, शनि ग्रह इनके मित्र ग्रह हैं और सूर्य, चंद्र इनके शत्रु ग्रह हैं। 

शुक्र ग्रह के कारकत्व - 

शुक्र के निम्नलिखित कारक तत्व शामिल हैं 
स्त्री,विपरित लिंग, सौंदर्य, कला, फोटोग्राफी, संगीत, नृत्य, सौंदर्य प्रसाधन, बगीचा, फूल, वाहन, सीनेमा,बेडरूम,फैशन, काम वासना,बकरी,आभूषण, इत्र, गाय, हीरा, जरकन, जनन अंग, प्रेम,शराब एवं अन्य मादक पदार्थ,मकान, कविता, आकर्षण, देह व्यापार, चित्रकला, व्याभिचार आदि शुक्र के कारक हैं ।

शुक्र के प्रबल होने का प्रभाव - 

जातक की जन्म कुंडली में शुक्र जब लग्न भाव में हों, मित्र की राशि में हों, शुभ ग्रहों से दृष्टि हो, मित्र ग्रह की युति हो तो शुक्र प्रबल हो जाते हैं। 
इस स्थिति मे जातक शुक्र के गुणों को प्रदर्शित करने लगता है. 
जातक का आभामंडल आकर्षित करने लगता है, विपरित लिंग के व्यक्ति खींचे चले आते हैं, 
जातक किसी ना किसी कला मे दक्ष हो जाता है, सुन्दर सुशील पत्नी मिलती है,स्त्री को धनवान और सुन्दर पति प्राप्त होता है,
जीवन में हर प्रकार के सुख-सुविधा प्राप्त होती है, सौंदर्य प्रसाधन के कार्यों मे सफल होता है , गुप्तांग पुष्ट और सुविकसित होते हैं। आंखे बड़ी और आकर्षित करती हैं । प्रेमी जोड़ा या पति पत्नी आजीवन अपने प्रेम मे पवित्रता रखते हैं। व्यापार अच्छा चलता है। भौतिक सुखों की तरफ रुझान होता है ।यात्रा करने के बहुत से अवसर प्राप्त होते हैं । 

शुक्र के साथ राहु - 

शुक्र के साथ राहु की युति हो या दृष्टि हो। या फिर शुक्र की दशा मे राहु की अंतर्दशा हो, या राहु के दशा मे शुक्र की अंतर्दशा हो तो शुक्र दूषित हो जाते हैं, ऐसे मे शुक्र को राहु बुरे कर्मों की तरफ धकेल देते हैं, 
 जातक नशे में लिप्त,  व्याभिचार मे लिप्त, वेश्यावृत्ति कराने वाला, अपने फायदे के लिए छल कराने वाला, बलात्कार को प्रेरित करने वाला, ड्रग्स का आदि, मांसाहारी बना देता है, शुक्र और राहु मिलकर कैसे भी गलत काम कराने वाला हो सकता है। 
ऐसे मे जातक को राहु के पावर को कम करने का उपाय करना चाहिए  ज्योतिष सलाहकार की मदत लेनी चाहिए । 

शुक्र के बुरे फल कब मिलते हैं 

जब जन्म कुंडली मे शुक्र अस्त होता है,तब अपने प्रभाव शुक्र नहीं दे पाता, इसे शुक्र का बुरा फल नहीं कह सकते हैं । शुक्र के उपाय करके इनके फल को बढ़ाया जा सकता है। 
शुक्र बुरे फल तभी देते हैं जब कुंडली मे बुरे ग्रह,शत्रु ग्रह की युति और दृष्टि हो, ऐसे मे जातक कुरूप,गुप्तांग अविकसित, व्यापार मे असफलता,प्रेमी - प्रेमिका मे अनबन, दाम्पत्य सुख मे निराशा,अपमान, प्रेम मे धोखा, गुप्तांग के रोग, गर्भ ना ठहरना, वीर्य मे कमी, सन्तान ना होना आदि समस्याओं का सामना करना पड़ता है ऐसे मे ज्योतिष की सलाह पर कोई उपाय करना उचित होगा परंतु सभी परेशानियों मे सफलता मिले ऐसा सम्भव नही है, कुछ समस्या का समाधान पाया जा सकता है । 

शुक्र से बनने वाले शुभ योग 

लक्ष्मी योग 

जब शुक्र और नवमेश (नवाँ घर के स्वामी वृहस्पति ) बलि होकर केंद्र मे या त्रिकोण मे स्थित हों तब  लक्ष्मी योग का निर्माण होता है । इस योग मे जन्मा जातक निडर, साहसी, बुद्धिमान, राजनीतिज्ञ, कुशल वक्ता, ज्ञानी बनाता है। 
 ऐसे जातक के पास अपार धन, वैभव और ज़न समर्थन प्राप्त होता है, जो भी चाहता है वह आसानी से पा लेता है, राजा की तरह जीवन जीता है, दूसरों की मदत के लिए हमेशा तत्पर रहता है, दानी होता है। सुन्दर जीवनसाथी प्राप्त होता है साथ ही जीवन साथी  बहुत प्यार करने वाले भी होते हैं ।

सरस्वती योग 

जब बुध देव, वृहस्पति देव, और शुक्र देव केंद्र के घरों में स्थित हों साथ ही द्वितीय या त्रिकोण भाव से सम्बंध बना रहे हों तो सरस्वती योग का निर्माण होता है, 
इस योग मे जन्मा जातक चालाक  ज्ञानी  और वैभवशाली होता है। 
जातक उच्च स्तरीय कलाकार, चित्रकार, फोटोग्राफर, संगीतकार, नर्तक,गणितज्ञ, ज्योतिष शास्त्र का विद्वान, सलाहकार, वक़्ता आदि मे महान नाम और धन अर्जित करता है । 

श्रीनाथ योग 

जब कुंडली मे सप्तम भाव के स्वामी दशम भाव में स्थित हो और दशम भाव के स्वामी नवम भाव में गोचर करें तो श्रीनाथ योग बन जाता है, कुंडली में ऐसे योग जातक को भगवान श्री हरि का प्रिय बना देता है,जातक के सारे काम  सफल होने लगते हैं,। जातक अपने कर्म से बहुत नाम,, कीर्ति,, धन, आदि प्राप्त करता है।