मंगल का ज्योतिष में स्थान

मंगल का संक्षिप्त परिचय -

मंगल एक लाल ग्रह में क्युकी मंगल पर लोहे के आक्साइड की मात्रा सबसे अधिक है। यह ग्रह सूर्य से 23 करोड़ किलो मीटर की दूरी पर स्थित है, और इसका व्यास 4220 मिल है। वह सूर्य का परिक्रमा 320 दिन और 18.2 घंटे मे पूरा कर लेता है। उसे उसके परिक्रमा काल कहते हैं। इसे बरम भी कहा जाता है इसका शाब्दिक अर्थ भूमि पुत्र से है। वैदिक ज्योतिष में मंगल को भगवान की श्रेणी में रखा गया है, जिसे मंगल देव ने कहा है, अपने उग्र स्वभाव के कारण उन्हें क्रूर ग्रह की श्रेणी में रखा गया है।

ज्योतिष में मंगल - - 



     मंगल ग्रह मेष और वृश्चिक राशि के स्वामी हैं और 27 नक्षत्र में मृगशिरा, चित्रा और धनिष्ठा भी इनकी उत्पत्ति मे आता है। 

कालपुरुष की कुंडली मे मंगल देव मकर मे उच्च के और कर्क मे नीच के होते हैं। 

मंगल के कारक तत्व - - 


लाल रंग, सेनापति, सहोदर, पुलिस, बिजली, इंजीनियर, तांबे से बने वस्तुए, सिंदूर, रक्त, मांस, ईंट, मिट्टी के बर्तन, गेरू, लाल मिट्टी, घुमची, लाल मिट्टी, मुकदमा, लड़ाई, मारकाट, हिंदी, विवाद द्वेष, मसूर की नाड़ी, रक्त स्राव, रक्त चाप, बंदर, लाल रंग के पक्षी, खेल मे रुचि, साहस आदि पर मंगल देव का प्रभाव होता है।


मंगल से होने वाले अशुभ फल या रोग -


मंगल यदि जातक पर अशुभ फल देने लगे तो व्यक्ति, उग्र, असुरसाल, फैंसी आदि दुर्गुणों से युक्त हो जाते हैं।] इसके अतिरिक्त शरीर पर होने वाले गुण जैसे - फोड़ा फुंसी, घाव, अंग - भंग, अल्सर, ट्यूमर, केंसर, रक्त। चितव, कोड़, लाल लाल होना, चिड़चिड़ापन आदि समस्याओं का सामना करना पड़ता है, इसकी शांति के लिए मंगल ग्रह का व्रत और शांति है। भगवान कार्तिकेय की पूजा करनी चाहिए। हनुमानजी की आराधना करने से भी मंगल के प्रभाव कम होते हैं, इसके अलावा ज्योतिषीय टोटके और समाधान भी कर सकते हैं।



शरीर के अंगों पर मंगल का नियंत्रण - -


कालपुरुष की कुंडली मे मंगल का स्थान यकृत, खुन, हीमोग्लोबिन, शोधन तंत्र पर होता है इसके अतिरिक्त मनुष्य के स्वभाव मे उग्रता, काम वासना पर भी इनका ही प्रभाव होता है।


मंगल से बनने वाले शुभ - अशुभ योग - -


जातक की कुंडली में मंगल शुभ योगों की अपेक्षा, अशुभ योगों से अधिक जाना जाता है, जिसे मांगलिक दोष कहा जाता है, यह एक योग है। जिसे कुजा योग कहा गया है। इस योग से मूल्यपूर्ण जीवन में नकारात्मक प्रभाव दिखाई देता है, पर यह अन्य क्षेत्रों में लाभदायक भी हो सकता है।



  कुजा योग (मांगलिक दोष) -


जब जातक की पत्रिका में पहले, चौथे, सातवे, आठवे और बारहवें घर मे मंगल विराजित हो जाते हैं तो यह योग बनता है, ऐसी कुंडली को मांगलिक कुंडली कहा जाता है। ऐसे जातकों के विवाह मे देरी और विवाह पाश्चर दाम्पत्य सुख मे कमी आ जाती है। पति-पत्नी मेँ गेहमा - गेहमी होती रहती है, कभी मार-पीट पारिवारिक हिंसा का रूप ले लेती है। तलाक या शादी विदाई का कारण भी बन जाता है, जिसकी कुंडली में यह दोष हो वह अभिमानी, घमंडी, अहंकारी हो जाता है। अक्सर इनकी पहली शादी सफल नहीं हो पाती, इसलिए इस दोष को काट के लिए शादी से पहले ही, जातक की शादी पीपल के पेड़, आम के पेड़, घड़े आदि से करवाकर इस योग के प्रभाव को काफी कम किया जा सकता है। इस क्रिया से जातक के अहंकार मे कमी आ जाती है। और जातक का दाम्पत्य सुखी रहता है।


अंगारक योग - 


राहु और मंगल जब युत का दृष्टि हो तो यह योग बनता है। इस योग का प्रभाव केवल देखा गया है, लेकिन कभी कभी इसके योग अच्छे परिणाम भी देते हैं जब जातक सेना मे हो, पुलिस मे हो, जहां जातक अपने उग्र स्वभाव का उपयोग कर सकते हैं, अन्यथा यह योग परिवारिक और सामाजिक जीवन के लिए घातक है है होता है, जातक लडाई झगड़े में युत, गुंडागर्दी, शराब, हथियार रखने वाला, मारकाट करने वाला, जेल, समाज मे तिरस्कार, अपमान, अंग-भंग, हिंसा का शिकार आदि समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।


रूचक योग और लक्ष्मी योग - 


रूचक योग के प्रभाव मे जातक विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, लेखक, कवि, कार्यों मे रुचि आदि अच्छे परिणाम देता है, रूचक योग के प्रभाव मे जातक 35 वर्ष के बाद इसकी शुभता मे वृद्धि होती है, और जातक नाम कमाता है, और धन। अर्जित करते हैं। 


लक्ष्मी योग से जातक धनवान होता है यह योग मंगल के साथ चंद्र के आने से बनता है, इस योग से जातक धैर्यवान, उर्जावन, होता है, अपने विवेक का इस्तेमाल सही दिशा में करते हैं। जातक अत्यधिक धन कमाने मे सक्षम हो जाता है, और धन का आगमन बना रहता है। 



मंगल पर जीवन, सम्भव या असंभव - 


वैज्ञानिकों ने अपनी लालसा और खोज की प्रवृत्ति से मंगल ग्रह पर जीवन की खोज करने के लिए अपने कदम उठाए हैं, भारत भी इस कार्य में बहुत कम आए हैं, 


दोस्तों आपको क्या लगता है 


क्या मंगल पर जीवन सम्भव है? 


टिप्पणी मे निश्चित श्रेणी


धन्यवाद