ज्योतिष में चन्द्र का स्थान और कारकत्व
चंद्रमा का परिचय और स्थिति--
चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह है, सूर्य के बाद चंद्रमा मनुष्य जीवन या पृथ्वी पर इनका सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है इसलिए सूर्य के बाद चंद्रमा का दूसरा स्थान रखा गया है। यह 24 घंटे में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करता है साथ ही अपने अक्ष पर भी उतने ही समय में घूम जाता है, इसकी गति नौ ग्रह में सबसे तेज है, सवा दो दिनों में एक राशि से निकलकर दूसरी राशि में प्रवेश कर जाते हैं। चन्द्रमा कर्क राशि के स्वामी हैं और रोहिणी, हस्त, श्रवण का स्वामित्व भी उनके पास है। यह 14 कलाओं से युक्त है, चंद्र का अपना कोई रोशनी नहीं होता है, इनकी चमक सूरज से आती है इसलिए चांद की रोशनी में शीतलता होती है ।चांद एक उपग्रह है - ज्योतिष शास्त्र में इसे ग्रह का दर्जा दिया गया है।
कवि और चंद्रमा--
चंद्रमा एक सुंदर शीतल 14 कलाओं से युक्त होने के कारण यह लेख को सौंदर्य प्रेमियों कवियों के रचना का केंद्र रहा है कई कवियों ने अपनी प्रेमिका के मुखड़े का वर्णन चांद से किया है। दोस्तों आप कल्पना करेंगे कि अगर, चांद ना हो तो क्या कम होगा में विचार प्रेषित जरूर करें चंद्रमा को कई नामों से संबोधित किया गया है।)
चंद्र के कारकत्व -
चंद्र का कारकत्व चावल, मन, माता, द्रव, चांदी, सफेद रंग, शीतलता, जल, मनोबल, सुख - शांति, धन का आदान-प्रदान-प्रदान, तरलता, बाजार, मामा, मानसिक स्थिति, जीवन, दृष्टि संबंधी, जल संबंधी रोग बर्फ, सीना, मोती, शराब, ज्वार, जौ आदि कारक हैं।
पृथ्वी पर चंद्र का प्रभाव--
समुंद्र पर चंद्रमा के कलाओं का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है, ज्वार भाटा चंद्रमा के कलाओं के कारण ही होता है। समय की गणना भारतीय ज्योतिष में चंद्र से ही की जाती रही है। जीवों के मानसिक स्थिति पर चंद्र खासा प्रभाव रखता है, वनस्पतियों में, औषधीय पौधों में भी चांद से आने वाली रोशनी का प्रभाव है। कुछ वनस्पतियों रात में चांद की रोशनी में खिलते हैं और औषधीय पौधे अपने औषधि गुण चांद के शीतलता भरी रोशनी में अपने आवश्यक गुणों को संचित करते हैं।
चंद्र का शरीर के अंगों पर नियंत्रण--
चंद्रमा का प्रभाव छाती, फेफड़े, बायां नेत्र आदि पर इसकी स्थिति के अनुसार प्रभाव पड़ता है। जन्मपत्रिका में चंद्र कमजोर होने से फेफड़े और छाती से संबंधित रोग और बाया नेत्र में दर्द होता है। जन्मपत्रिका में छठे, आठवें और बारहवें घर का चंद्रमा शुभ प्रभाव नहीं दे पाता है।
चंद्र ग्रहण और उसका प्रभाव--
वर्ष में दो से तीन बार चंद्रग्रहण होता है, चंद्र ग्रहण की स्थिति तब बनती है जब सूर्य और चंद्रमा के बीच पृथ्वी आ जाती है। और पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है यह घटना पूर्णिमा के दिन घटती है, ज्योतिष में चंद्र ग्रहण को शुभ-अशुभ प्रभाव में देखा जाता है। जिस राशि पर ग्रहण लगता है उस राशि के जन्मे जातकों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। पूर्णिमा के आसपास मन अधिक चंचल और अमावस्या के आसपास मन शांत रहता है, मानसिक रूप से पीड़ित व्यक्तियों में यह देखा गया है कि पूर्णिमा के समय उनका मस्तिष्क अत्यधिक व्यग्र हो जाता है।
चंद्र से बनने वाले योग--
पत्रिका में चंद्रमा से तीन प्रकार के शुभ योग बनते हैं पहला-अनफा योग, दूसरा सुनफा योग और तीसरा दुर्योधन योग।
अनफा योग-
जिस घर में चंद्रमा हो, उसके पिछले घर में सूर्य, राहु, केतु के अलावा कोई भी ग्रह हो तो यह योग बनता है। यदि सूर्य पिछले भाव में हो तो यह योग भंग हो जाता है। इस योग से व्यक्ति सुख सुविधाओं से युक्त यात्रा लव, व्यवहार कुशलता और राजनीति में अच्छा नाम कमाता है।
सुनफा योग -
चंद्रमा से दूसरे भाव में चंद्रमा से दूसरे भाव में सूर्य, राहु, केतु को छोड़कर जब कोई ग्रह हो तो यह योग निर्मित होता है। अगर चंद से दूसरे भाव में सूर्य स्थित हो तो किसी भी ग्रह से बनने वाला यह योग भंग हो जाता है। इस योग के बनने से जातक को शिक्षा में काफी सफलता मिलती है, वह बलवान और वाकपटु होता है और उसे प्रशासनिक कार्यों से बहुत सफलता मिलती है।
दुरधारा योग--
चंद्र से दूसरे और बारहवें घर में सूर्य राहु केतु को छोड़कर कोई भी ग्रह हो तो यह योग निर्मित होता है। जिस कुंडली में यह योग बनता है वह कुंडली का जातक जन्म से ही संपन्न और समृद्ध होता है। उसे किसी भी प्रकार का परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ता है और जातक सुखी जीवन व्यतीत करता है। कभी-कभी व्यक्ति वैराग्य की ओर अग्रसर भी हो सकता है। व्यक्ति को धर्म से अत्यधिक लगाव होता है और व्यक्ति धर्मा होता है।
चंद्र की कला और तिथि -
चंद्रकला के आधार पर तिथियों को 15 दिन के दो पक्षों में बांटा गया है। पहला पक्ष कृष्ण पक्ष, दूसरा पक्ष शुक्ल पक्ष।
शुक्ल पक्ष के अंतिम तिथि को पूर्णिमा कथा कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि को अमावस्या कहते हैं।
तारीखों के नाम तिथियों के नाम निम्नलिखित है
१ पूर्णिमा २ प्रतिपदा ३ द्वितीया ४ तृतीया ५ चतुर्थी पंच पंचमी ष्ठ षष्ठी ष्ठ सप्तमी ९ अष्टमी १० नवमी ११ नवमी ११ नवमी ११ दशमी १२ एकादशी ३ द्वादशी १४ त्रयोदशी १५ चतुर्दशी और १६ अमावस्या को।
सूर्य से बनने वाले तिथि चंद्र से बनने वाले तिथि छोटे होते हैं, इसलिए दिन में और तिथियों में अंतर आ जाता है। कभी कभी देखा जाता है कि दिन और रात में कभी भी तारीख बदल जाती है ।हिंदू धर्म में खजूर का बहुत बड़ा महत्व है।)
एकादशी, तेरस, नवमी, अष्टमी, चतुर्थी, पूर्णिमा और अमावस्या आदि का बड़ा मान्यता है।
पूर्णिमा -
कार्तिक पूर्णिमा, माघ पुर्णिमा, शरद पूर्णिमा, बुध पुर्णिमा, गुरु पूर्णिमा आदि।
आमावस्या-
मौनी अमावस्या, सोमवती अमावस्या, शनि अमावस्या, हरियाली अमावस्या, दिवाली अमावस्या, भौमवती अमावस्या, सर्व पितृ अमावस्या आदि।
एकादशी-
कामदा एकादशी, वरुथिनी एकादशी, मोहिनी एकादशी, अपरा एकादशी, निर्जला एकादशी, योगिनी एकादशी, देव शयनी एकादशी, कनिका एकादशी, पुत्रदा एकादशी, अजा एकादशी, परिवर्तिनी एकादशी, इन्दिरा एकादशी, पापांकुशा एकादशी, आदि।
इसके अलावा तिज, छठ आदि का भी बहुत बड़ा महत्व है।
शिव और चंद्र का संबंध--
भगवान शिव एक आदियोगी हैं। वे चंद्रमा को अपने सिर पर धारण किए हुए हैं, इसका अर्थ यह है कि एक योगी एक साधु या एक साधक, योग और ध्यान के माध्यम से चंद्रमा के होने वाले प्रभाव को शून्य कर सकता है या, अपने मन को जीत जाता है। जब तक वह स्वयं से ना चाहे चंद्रमा का कोई भी प्रभाव योगी के शरीर और मन पर नहीं पड़ सकता। जय आदियोगी, ओम नम: शिवाय, हर हर महादेव।
जन्मपत्रिका में चंद्र--
जन्मपत्रिका में चंद्र का विशेष महत्व है, चंद्रमा से व्यक्ति का व्यक्तित्व, स्वभाव, सौंदर्य आदि निश्चित होता है। चंद्र अच्छी स्थिति में हो, स्वगृही हो, शुभ या मित्र योजनाओं से युत या दृष्टि हो तो इसका अच्छा प्रभाव देखने को मिलता है।
इसके विपरीत यदि चंद्रमा खराब घर में हो, शत्रु ग्रह से युत हो और शत्रु ग्रहों की दृष्टि हो तो व्यक्ति पर इसके बुरे प्रभाव दिखाई देने लगते हैं, इसके बुरे प्रभाव को कम करने के लिए ज्योतिषी उपाय करने से इसमें लाभ मिल जाता है।

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