केतु का ज्योतिष में स्थान एवं कारक

केतु का संक्षिप्त परिचय 

केतु एक छाया ग्रह है वास्तव मे इसका कोई अस्तित्व नहीं है, यह एक बिन्दु मात्र है, परंतु  वैदिक ज्योतिष मे केतु को ग्रह का दर्जा दिया गया है, इसका मतलब यही है कि वास्तव में जो नहीं है फिर भी उसका अस्तित्व है। केतु को हिन्दू संस्कृति के अनुसार राहु का ही गर्दन के नीचे का हिस्सा माना गया है। आपको राहु वाले लेख मे विस्तार से बताया गया है, आप अगर नहीं पढ़ पाए हों तो उसे पढ़ लेना उचित रहेगा। राहु और केतु एक दूसरे के विपरित होते हैं जैसे राहु अगर सूर्य के पूर्व मे है तो केतु सूर्य के पश्चिम मे होगा, भगवान् विष्णु जानते थे कि राक्षस स्वर भानू का सिर काटकर अलग करने के बाद उसे  सूर्य के के केंद्र से विपरित फेंक दे या हटा दिया जाए तब ही वे एक दूसरे पास आकर नहीं जुड़ पाएंगे ऐसा इसलिए कि उसने अमृत पान लिया था और उसका मरना नामुमकिन था। 
 English में केतु ड्रैगन टेल कहा गया है जिसका शाब्दिक अर्थ किसी दैत्य की पूंछ है। 


केतु और ज्योतिष 

केतु एक विच्छेदात्मक ग्रह है। 
 इसका अर्थ है कि जब भी इसकी दशा और अंतर्दशा चलेगी और कुण्डली में शुभ अवस्था मे ना हों तो यह विछोह कराने का काम करते हैं जैसे किसी का विदेश जाना या बसना। माता - पिता से अलग रहना, पति पत्नी का अलग थलग हो जाना, तलाक कराना, लड़ाई करा देना,किसी अपने का हादसे मे मौत हो जाना आदि।
 
   केतु  आध्यात्मिक ग्रह है। 
इसका अर्थ यह है कि जिस जातक के ऊपर केतु बलि अवस्था मे हो, उसका किसी से मोह भंग हो सकता है, दुनिया-दारी का त्याग कर सकता है, साधू - सन्यासी बन जाता है। जातक एकान्त मे रहना पसंद करता है, किसी गंभीर चिंतन मे मस्त रहता है। जातक शांत रहता है।अपने भेद छुपाने लगता है इसका कारण यह भी होता है कि उसे लगने लगता है कि जैसा वह महसुस करता है उसकी इस दशा को कोई समझ नहीं पाएगा। जातक भ्रमित भी हो सकता है, किसी पर विश्वास नहीं कर पाता, हमेशा संदेह होता रहता है। 

 केतु मोक्ष कारक ग्रह है। 
      मृत्यु के बाद क्या, ईश्वर प्राप्ति, तंत्र-मंत्र, साधना, पूजा पाठ, वैराग्य,अभौतिक ज्ञान, धर्म आदि केतु के प्रभाव से ही होता है। 

केतु के कारक 

केतु वैसे तो भौतिकता से परे का सांकेतिक नाम हैं ज्यादातर यह भौतिक गुणों को प्रकट नहीं करता, इसलिये इसे अध्यात्म दे जोड़कर देखा जाता है, फिर भी, खाली मिट्टी के बर्तन, श्मशान, मृत्यु, आत्मा, संवेदना, दुःख, भय, अँधा, बहरा, मन की ईच्छा, गहरा अंधेरा कुआं, खण्डहर, आदि केतु के कारक हैं। 

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