ज्योतिष में बृहस्पति के कारक एवं प्रभाव - -
बृहस्पति हमारे सौर मंडल के सबसे बड़े ग्रह है।इसका निर्माण हिलीयम और हाइड्रोजन गैस से बना हुआ है। इसका तापमान 145°c है। इसके उपग्रहों कि संख्या 64 हैं, ये सूर्य से ग्रहों मे पाँचवे स्थान पर है। सौर मंडल के सात ग्रह के द्रव्यमान का ढाई गुना बड़ा है। इसे रात्री मे देखा जा सकता है। इसका वायुमंडल 5000 km तक फैला हुआ है जो अन्य ग्रहों की अपेक्षा सबसे अधिक हैं, बृहस्पति का कोई धरातल नहीं है। बृहस्पति सदा अमोनिया क्रिस्टल के बादलों से ढका रहता है। बृहस्पति की अंग्रेजी मे Jupiter और वैदिक ज्योतिष में गुरु कहा गया है। गुरुवार इन्हीं के नाम पर रखा गया है। गुरुवार को वृहस्पति वार भी कहा जाता है।
गुरु को सर्वाधिक शुभ ग्रह माना गया है तथा देवताओं के गुरु माना जाता है।
बृहस्पति के कारक तत्व
केले का वृक्ष, गुरु, शिक्षक, पीला रंग, पीले फल, पीले पुष्प, बड़े भाई, चर्बी, पेट,मछली, हाथि, बाज, घोडा, सोना, धार्मिक कार्य, ब्राम्हण, हल्दी, पीली दाल, केसर, सन्तान, वैवाहिक जीवन, पीपल, पीले रंग की मिठाई, पीतल के बर्तन आदि बृहस्पति के कारक तत्व हैं।
ज्योतिष में बृहस्पति देव
बृहस्पति को कुंडली में सर्वाधिक शुभ ग्रह माना गया है।
बृहस्पति धनु और मीन राशि के स्वामी हैं तथा 27 नक्षत्रों में पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वा भाद्रपद के स्वामी हैं।
कालपुरुष की कुंडली मे 2,5,7,9,11वें भाव में शुभ फल देते हैं, जिस घर में गुरु हों उस भाव से एक घर आगे शुभ फल मे वृद्धि कर देते हैं।
गुरु अगर लग्न मे हों तो जातक, धार्मिक कार्यों में रुचि लेता है, परोपकारी होता है, जातक की सन्तान अद्भुत गुणों से युक्त होते हैं। मान सम्मान की कमी नहीं होती, दानी होता है। दिल खोल कर दूसरों की मदत के लिए अग्रसर होता है, ज्ञानी होता है, धन धान्य से परिपूर्ण होता है तथा अच्छा शिक्षक होता है।
जब बृहस्पति शत्रु ग्रह की युति हो, शत्रु ग्रह की दृष्टि हो तो या अस्त हो जाएं तो वृहस्पति पीड़ित हो जाते हैं तो बुरे फल देने लगते हैं तब जातक को भाइयों से नहीं बनती, दाम्पत्य सुख नहीं मिल पाता, धर्म के कार्यों मे अरुचि होती है, गुरुओं का अपमान करता है, नौकरी और रोजगार मे सफलता नहीं मिलती। बुद्धि विवेक खो जाता है, मोटापा बढ़ता है,
गुरु से बनने वाले योग
हंस योग :
यह पंच महापुरुष योगों में प्रमुख है। गुरु स्वराशि, उच्च राशि या मूल त्रिकोण में न होकर केंद्र स्थित होने पर हंस योग होता है। ऐसा जातक सुंदर व्यक्तित्व, उच्च चरित्र व पद प्राप्त करता है तथा बात का धनी होने के साथ-साथ निष्पक्ष निर्णय करने की क्षमता रखता है।
गजकेसरी योग :
चंद्रमा से केंद्र में (1,4, 7, 10) बृहस्पति स्थित हो तो गजकेसरी योग होता है। यदि बुध या शुक्र नीच राशि में स्थित न होकर या अस्त न होकर सम्पूर्ण दृष्टि से देखें तो प्रबल गजकेसरी योग होता है। यह सामान्य व्यक्तियों की कुंडली में भी देखा जा सकता है। किंतु ग्रहों के प्रबल न होने के कारण प्रभावयुक्त नहीं होता।
सरस्वती योग :
गुरु चंद्रमा के घर में चंद्रमा गुरु के घर में हो और चंद्रमा पर गुरु की दृष्टि हो तो यह योग होता है। ऐसा जातक सरस्वती का वरद पुत्र होता है और वह सर्वत्र प्रसिद्धि व धन प्राप्त करता है। विश्व प्रसिद्ध कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की कुंडली में यह योग देखिए-मीन लग्र में चंद्रमा, मेष में सूर्य, बुध, शुक्र, वृष में मंगल, मिथुन में केतु, कर्क में गुरु, सिंह में शनि, धनु में राहु।
कलानिधि योग :
जातक परिजात के अनुसार बृहस्पति द्वितीय या पंचम भाव में बुध या शुक्र की राशि में अथवा उनमें से किसी से युक्त अथवा दृष्ट हो तो कलानिधि योग होता है। इस योग वाला जातक अनेक गुणों से सम्पन्न, राज्य से भी सम्मान प्राप्त तथा रोगमुक्त होगा।
राजयोग :
द्वितीय भाव में बृहस्पति के साथ शुक्र होने पर तथा कर्क लग्र में भी चंद्र व गुरु होने पर राजयोग होता है।

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