ज्योतिष में सूर्य के कारक 

1) -सूर्य का ज्योतिषीय परिचय -  

सूर्य एक चमकदार तारा है लेकिन ज्योतिष शास्त्र में इसे ग्रहों की संज्ञा दी गई है, हमारे सौरमंडल का संचालन सूर्य से ही होता है इसलिए इसे ग्रहों का राजा भी कहा गया है। हिंदू धर्म में सूर्य का बहुत बड़ा महत्व माना गया है, इसलिए उन्हें सूर्य नारायण और सूर्य देव कहा जाता है। सूर्य सौर ऊर्जा का स्रोत है, सूर्य के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती इसलिए सूर्य प्रत्यक्ष ईश्वर स्वरूप हैं, जिन्हें हम अपनी आँखों से देख रहे हैं। सूर्य को पुरुष प्रधान ग्रह माना गया है। 



2) - कारकत्व - 

सूर्य के कारकत्व निम्नलिखित है -  
 सूर्य पिता, राजा, आत्मा, तांबा, रूबी, पूर्वज, अधिकारी, सरकारी पद, दाएं नेत्र , हृदय, घाव, हड्डी, चर्म रोग, मुखिया, अग्नि, दृष्टि, आध्यात्मिक विद्या, लाल-नारंगी- केसरिया   रंग, शिव, नारायण, सच्चिदानंद, पित्त, पराक्रम, ऊर्जा, चौपाया, गेहूँ, चंदन आदि के कारक है।
 

3) - सूर्य का प्रभाव --- 

  सूर्य जन्मपत्रिका में अच्छी स्थिति में हो तो, जातक राजनेता, सरकारी पद पर आसीन, पिता से संबंधित लाभ, अच्छा स्वास्थ्य, तेजवान, अच्छा स्वास्थ्य, बलवान शरीर, राजसी रहन- सहन, धन-धान्य से परिपूर्ण स्वादिनी, नौकर चाकर से उक्त, तेज दृष्टि, सूजन, अच्छा शारीरिक गठन और रंग रूप और मजबूत हृदय वाला और दानी होता है।

इसके विपरीत यदि जन्मपत्रिका में खराब स्थिति में हो तो जातक कमजोर हृदय वाला, दुर्बल शरीर, दृष्टि में कमी, हड्डियों से संबंधित रोग या हड्डियों का टूटना, शरीर में सूजन, चर्म रोग, भूख की कमी, जोड़ों का दर्द, पेट संबंधी रोग, पीलिया, ज्वर, जलन आदि से रहता है। 


4) - कुंडली में सूर्य की शुभ स्थिति-- 

 मेष राशि में सूर्य उच्च के होते हैं, सूर्य केंद्र के  
घरों में और मूल त्रिकोण स्वयं की राशि मित्र की राशि और शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक को शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं। छठे, आठवें और बारहवें घर में सम होते हैं। उनके मित्र ग्रह मंगल, गुरु, चंद्र और बुध मे सम होते हैं। सूर्य हर्षाढ़ा, हस्त, उत्तरा फाल्गुनी, हर्षाढ़ा   और अभिजीत नक्षत्र के स्वामी होने के साथ सिंह राशि के स्वामी हैं। उनका तत्व अग्नि है। 
 जन्मपत्रिका में सूर्य की अशुभ स्थिति-- कुंडली में 
जब सूर्य खराब स्थिति में हो तो जातक को इसके प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिलता है, तुला राशि में सूर्य नीच का होता है, जब सूर्य शत्रु राशि में हो शत्रु ग्रह में दृष्टि हो और शत्रु से हो। हो। हो। हो। हो। हो। युत हो तो बुरे परिणाम प्राप्त होते   हैं। स्थिति में जातक को पित्र दोष और उपरोक्त परेशानी के साथ, पैतृक संपत्ति से वंचित और पिता से पीड़ित या पिता को कष्ट, नेत्र पीड़ा, हृदयाघात आदि से पीड़ित होता है। इसके ज्योतिषी उपाय द्वारा एक के प्रभाव से बचा जा सकता है। 


5) - सूर्य के बुरे प्रभाव को कम करने का उपाय-- 

यदि सूर्य खराब प्रभाव मे हो तो, गेहूं, तांबा, लाल वस्त्र, चंदन की लकड़ी, लाल फूल आदि दान करने से शुभ परिणाम मिलते हैं।  रूबी धारण करने से भी इसके अच्छे परिणाम मिलते हैं, सुबह के समय स्नान करने के सूर्य का बीज मंत्र जाप करने से शांति प्रदान होती है, और प्रात: काल सूर्य नमस्कार करने से भी रोगों से निजात मिलती है। 


6) - शरीर के अंगों पर सूर्य का नियंत्रण-- 

दाएं नेत्रहीन, हड्डी, नाभि, ह्रदय, पेट, मस्तिष्क आदि पर सूर्य का नियंत्रण होता है।  अगर जातक की कुंडली में सूर्य खराब स्थिति में है तो ये सभी शारीरिक अंगों पर कोई न कोई बीमारी या परेशानियां हो सकती हैं।  और यदि जातक की कुंडली में सूर्य अच्छे स्थान पर अच्छी स्थिति में हो तो एक शारीरिक अंगों पर सूर्य का शुभ प्रभाव पड़ेगा जिससे शरीर के अंग मजबूत और स्वस्थ बने रहेंगे। 


7) -सूर्य ग्रहण का प्रभाव - 

 सूर्य ग्रहण कैसा लगता है इसके बारे में तो लगभग सभी को पता है, हम इसके प्रभाव को जानने की कोशिश करेंगे, जीवन ऊर्जा देने वाला सूर्य को अगर ग्रहण लगे तो निश्चित रूप से यह शुभ फलदाई नहीं होगा   , लेकिन ज्योतिष शास्त्र में माना गया है। । उस सूर्य ग्रहण में किए गए जाप मंत्र सिद्धि का तत्काल प्रभाव देखने को मिलता है या मंत्र सिद्ध हो जाता है, लेकिन जनजीवन पर इसका प्रभाव आंशिक रूप से पड़ता है, हमें इसे खुली आंखों से नहीं देखना चाहिए।  प्राकृतिक आपदाओं, राजनीति ऊथल-पुथल संपत्ति विवाद, पुराने संघर्ष का उभरना, चोट लगना, दुर्घटना होना आदि की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। 


8) - सूर्य से बनने वाले महत्वपूर्ण शुभ योग-  

 वेशी योग-

 यदि सूर्य से द्वितीय भाव में ये पांच ग्रह मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि हो तो यह योग बनता है।  जिस जातक की कुंडली में यह योग बनता है, उसके निम्न प्रकार के फल उजागर होते हैं

  सौम्य दृष्टि, आलसी, सुख संपन्न, मजबूत शरीर और धनवान होता है। 


वाशी योग  

यदि सूर्य से 12 घर में मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि में से ग्रह उपस्थित हो तो वाशी योग का निर्माण होता है।  वाशी योग से निर्मित कुंडली वाला जातक कार्य में निपुण, दानी, विद्यावान, बलिष्ठ, यशवंत, अति सुंदर, राजा का प्रिय, अच्छा पद वाला, विख्यात, सभी का प्रिय, शुभ पैरों से युक्त होता है। 

उभयचारी योग - 

जब सूर्य से द्वितीय और द्वादश में मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि में से कोई ग्रह स्थित हो तो यह योग बनता है। अगर जातक के कुंडली में यह योग बनता है तो जातक के गुणों में कुछ परिवर्तन होते हैं, जातक अच्छा पूल, मीठा वचन बोलने वाला, यशस्वी, धनी, सभी का ध्यान रखने वाला होता है।  सभी उसे बहुत प्यार और सम्मान देते हैं।

बुधादित्य  योग  

 सूर्य और बुध एक ही भाव में स्थित हो तो यह योग बनता है, इसके शुभ फल जातक को बुद्धिमान, विद्वान, बलशाली, उन्नति शील, सिद्धांत वादी और यशस्वी बनाता है।