सनातन जीने का आधार
सनातन क्या है
हमारे प्राचीन ऋषि मुनि, वेदों के ज्ञान रखने वाले विद और विशारद उनके बाद धर्म गुरु आदि नें जो भी सनातन के सबंध में लिखा और लोगों तक सनातन के बारे में कहा गया उसे ज्यादातर धर्म से जोड़कर बताया गया है। इसमें सभी के राय अलग अलग हो सकते हैं। मनुष्य एक छोटी सी उम्र लेकर इस दुनिया में जन्म लेता है, वह.चाहता है कि जीवन के सारे रस लेकर इस दुनियां से उसे विदा हो जाना है। उसे बेकार की गफलत मे पड़ने के लिए कभी समय नहीं रहता है।
इससे होता यह है कि जिधर जाए जाना आसान होता है वह उस रास्ते को चुनता है। मानव के इसी प्रवृत्ति के कारण धर्म के धंधा चमकाने वाले लोगों का जन्म होता है, और यही धंधा करने वाले व्यापारियों के विस्तार से एक धर्म और मजहब का उदय होता है।
और सनातन को दो से तीन और तीन से चार खंड में विभाजित कर दिया जाता है।
जिन लोगों को सनातन से दूर कर दिया गया वे लोग अपनी आयु के एक पड़ाव में ही एक युग की दूरी बना लेते हैं। फिर उन्हें सनातन मे वापस लौट आने के सारे रास्ते बंद कर दिए जाते हैं। इससे होता यह है कि हर कोई अपने आपको बड़ा साबित करने में लगा रहता है। और धरती पर संघर्ष उत्पन्न होने लगता है, अपने धर्म को साबित करने के लिए युद्ध होते हैं और होते रहे हैं इतिहास गवाह है।
हम सनातनी क्यों हैं
हम का मतलब सारे मानव से है, मनुष्य जीवों में सबसे ज्यादा बुद्धिमान और सू-संस्कृत है और बेहतर तौर तरीकों को मानकर चलने वाला जीव है, मनुष्य को ग्यान विज्ञान को विकसित करने के अद्भूत जिज्ञासा रहीं हैं। इसलिए मानव एक नए युग का निर्माण करता है, जिसमें वह अपने आपको, अपने समाज को एक सर्वमान्य ज़न समान्य नियम कायदों से युक्त संसार में पाता है जिसे वह सनातन कहता है। और इसी संस्कृति का दिशा निर्देश करने वाली रचना का नाम "मनुस्मृति" है।
इस तरह हम और हमारा समाज सनातनी हो गए। हमे इसे धर्म से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए, धर्म सनातनी कैसे हुआ उसकी चर्चा हम आगे करेंगे।
सनातन धर्म कैसे बना
ईस्वी पूर्व सारा संसार सनातनी था ऐसा क्या हुआ कि कई धर्म बन गए और लोग सनातन से दूर हो गए।
आपने सप्तर्षि का नाम सुना ही होगा, सप्तऋषि सामूहिक रूप से सात ऋषियों को कहा जाता है, जिसका वर्णन खास तौर पर वेदों और अन्य धार्मिक ग्रन्थों में मिलता है। वर्तमान सप्त ऋषि समूह में शमिल ऋषियों के नाम- कश्यप, अत्री, वैशिष्ट, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज हैं। वैदिक ऋषियों में भारद्वाज ऋषि का स्थान भी काफी ऊंचा है।
इन्हीं ऋषि के सिर पर ही सनातन के विस्तार का भार था।
इसलिए जाहिर है कि ये सात ऋषिकुल, ये सात ऋषि हमारी विचार धरोहर के पुरोधा होने के कारण हमारी स्मृति में अमर हो गए और बाद में कभी व्यावसायिक तो कभी राजनीतिक कारणों से सप्तर्षियों के नामों में और अवधारणा में फर्क आता गया हो तो कोई क्या कर सकता है? पर अगर तर्क और इतिहास की सीढ़ी चढेंग़े तो इस अवधारणा के शिखर पर आप इन्हीं सात ऋषियों को बैठा पाएंगे। इसलिए अचरज नहीं कि किसी भी सप्तर्षि गणना में इनमें से अधिकांश नाम, कभी चार, कभी पांच तो कभी छह नाम इन्हीं में से आते हैं और इनमें से हरेक का सप्तर्षित्व आज तक सुरक्षित है।
फिर इनमें से हर कुल के प्रवर्तक ने या उसके परवर्ती ने देश की सभ्यता के विकास में अपना अनूठा योगदान किया है। आद्यवसिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो मैत्रावरूण वसिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया जिसका अनुकरण करते भविष्य में किसी से नहीं बना। विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मन्त्र की रचना की जो भारत के हृदय में और जिह्ना पर हजारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा है।
अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह अद्भुत योगदान दिया था। अत्रि लोग ही सिन्धु पार कर ईरान चले गए थे, जहां उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया। इस देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों ने व्यवस्थित किया तो भरद्वाजों में से एक भरद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का उत्तराधिकारी बन राजकाज करते हुए मन्त्र रचना जारी रखी। वामदेव ने इस देश को सामगान दिया तो शौनक ने दस हजार विद्यार्थियों के गुरूकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया।
असभ्य सनातन से विमुख है
सनातन को अंगीकार करने वाला कभी भी असभ्य नहीं हो सकता है, सनातन एक सोच है जो मानव के अधिकार और कर्तव्य को लेकर एक साथ सोचता है जो एक सभ्यता की ओर लेकर जाता है। जो जीवन यापन का आधार है। और जो असभ्य है वह अपनी सनातनी परंपरा से विमुख हो गया है।
असभ्य कौन है?
मन, कर्म और वचन से जो लोगों से नफरत, हिंसा, मानवता के विरुद्ध कार्य करने वाले लोग असभ्य हैं चाहे वह किसी भी धर्म को मानने का दावा करते हों उनका यह दावा निश्चित ही एक छलावा है। यह लोग धार्मिक होते हुए भी अधर्मी हैं। सभ्य होते हुए भी असभ्य हैं, मानवता के हित की रक्षा के आड़ में असली मे यह लोग समाज मे असमाजिक और अराजक तत्वों के श्रोत हैं।
अगर आप धर्म की राह पर चलने वाले व्यक्ति हैं तो आपको किसी धर्म का जानकार होना जरूरी नहीं है बस इतना समझना जरूरी है कि क्या सही है और क्या गलत है। आपको यह भी पता होना चाहिए कि आपको कोई आपका दिमाग सम्प्रेषण करने की कोई कोशिश तो नहीं कि जा रही है।

Social Plugin